Wednesday, 20 December 2017

मुमकिन हो तो

भागता फिर रहा हूँ अपने ही सवालो से

मुमकिन हो तो कुछ जवाब जिंदगी तू ही बता दे

अपनी ही बन्दिशों में जकड़ा हुआ हूं मैं

मुमकिन हो तो इस जिंदगी से आजाद करा दे

गलती बस इतनी थी पथ से भटका पथिक था मैं

गर मुमकिन हो तो मुझे मेरी मंजिल तक पहुँचा दे

सपने देख लिए थे खुली आँखों से मैंने कभी

मुमकिन हो तो उन ही सपनो से मिला दे

देखे थे डूबते हुए सूरज अक्सर शाम को आसमान में कही

अगर मुमकिन हो तो उसका ही पता बता  दे

कुछ ज्यादा मांग सकता नही तुझसे ऐ जिंदगी

मुमकिन हो तो मुझे ईशवर से ही मिला दे
                                  
               (आदित्य नाथ यादव)

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