Thursday, 28 September 2017

कुछ दूर हूँ

गहरे समंदर में लगाये है गोते कई

किनारो से महज कुछ दूर हूँ।

बहता हूँ पानी सा हर समय लोगो

की प्यास बुझाने के लिए

जो पानी होकर खुद की प्यास न

बुझा सके वो बहता दरिया हूँ ।

सपने देखे है बंद आँखों से कई मैंने

उनके साकार होने से कुछ दूर हूँ ।

की है कोशिश कुछ अच्छा कर जाने की

राहो की मुश्किलों से अनिभिज्ञ सपने में मग्न हूँ।

पार किया है जामें ऐ दुःख का दरिया ।

सुख के प्याले से महज कुछ दूर हूँ।

मेरा हाल भी ठीक वैसा है जैसे

भरी बरसात में गिरती स्वाति की एक बूँद।

उसे पाने के लिए प्यासे मेढ़कों की करुण ध्वंद।

आयाम,विराम, संघर्ष सब देखे है मैंने

अंधरे समाज मे ताने बाने बुने है कई मैंने

मगर इनकी हकीकत से कोसो दूर हूँ । 
  
                    (आदित्य )
                 
              

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