Sunday, 13 August 2017

उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है

    उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है                                             
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
टूट कर बिखर गयी थी सब उम्मीदे उसकी
वो धैर्यवान इंसान फिर उठ खड़ा है
अपने सपने के लिए फिर चल पड़ा है
हौसले बुलंद है उसके वो फिर लड़ पड़ा हैं
उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
क्या खो देगा आगे चलकर उसे नही पता है
क्या खो दिया उसने अबतक उसे नही पता है
अपनी धुन में मग्न सपने वो देखता है
उसे डर नही है किसी तरह का क्योंकि
गिरना,उठना, फिर चलना ये जिंदगी का फ़लसफ़ा है
उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
                                (आदित्य)                                           

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