Thursday, 28 September 2017

कुछ दूर हूँ

गहरे समंदर में लगाये है गोते कई

किनारो से महज कुछ दूर हूँ।

बहता हूँ पानी सा हर समय लोगो

की प्यास बुझाने के लिए

जो पानी होकर खुद की प्यास न

बुझा सके वो बहता दरिया हूँ ।

सपने देखे है बंद आँखों से कई मैंने

उनके साकार होने से कुछ दूर हूँ ।

की है कोशिश कुछ अच्छा कर जाने की

राहो की मुश्किलों से अनिभिज्ञ सपने में मग्न हूँ।

पार किया है जामें ऐ दुःख का दरिया ।

सुख के प्याले से महज कुछ दूर हूँ।

मेरा हाल भी ठीक वैसा है जैसे

भरी बरसात में गिरती स्वाति की एक बूँद।

उसे पाने के लिए प्यासे मेढ़कों की करुण ध्वंद।

आयाम,विराम, संघर्ष सब देखे है मैंने

अंधरे समाज मे ताने बाने बुने है कई मैंने

मगर इनकी हकीकत से कोसो दूर हूँ । 
  
                    (आदित्य )
                 
              

Sunday, 17 September 2017

यह क्या कर डाला??

शोरहत बुलंदियों की चाहत में
मैंने यह क्या कर डाला ।।

सोचा था अपनी सोच से
बदल सकूँ कुछ को ।।

जब देखा दिल की गहराइयों में
झांक कर

मैंने खुद को बदल डाला ।।

पीकर मैं दुःखो की हाला ।।

पढ़ता रहा कविता  मधुशाला ।।

न छलकती है आँखों से आँसू
की कुछ बुंदे ।।

यूँ नही मिलती किसीको मधुशाला

हासिल यूँ ही नही होता सबकुछ ।

बर्बाद होता है अपना बहुत कुछ ।

शोहरत ,बुलंदियों की चाहत में

खुद को तबाह कर डाला ।।

सोचा ,देखा महसूस किया तो

समझा मैंने खुद को  बदल डाला

मैंने यह क्या कर डाला क्यों

खुद को इस तरह बदल डाला ।।
                           
                              (आदित्य)

Sunday, 10 September 2017

दुःख की सुनामी

आयी थी दुःख की सुनामी जिंदगी में हमारे 

छोड़ गई हमे तिनके के सहारे।।

छीन गया सिर से वो पिता का प्यार 

हाथ मे आया तो बस नौकरी का उत्तराधिकार ।।

न  पूरी तरह अभी मैं हो पाया था कली से फूल

पिता के जाने के बाद हमे अपने ही गये भूल।।

इस नौकरी में आने के बाद थोड़ा खुश हुआ

पर न नींद आती न चैन आता

बस बेचैन मन यही सोचता कि क्या मैं

मृतक आश्रित नौकरी करने के लिए पैदा हुआ।।

यह प्रशिक्षण तो बहाना था दोस्तो 

हम लोगो को बस अपना दुःख बाँटना था।।

बुरी लतो को छोड़ दो दोस्तों

बढ़ चलो अपने भविष्य की ओर 

क्योंकि मैं नही चाहता किसी और के

कदम बड़े मृतक आश्रित नौकरी के और ।।।।।।।

                                                    (आदित्य)

Sunday, 13 August 2017

उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है

    उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है                                             
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
टूट कर बिखर गयी थी सब उम्मीदे उसकी
वो धैर्यवान इंसान फिर उठ खड़ा है
अपने सपने के लिए फिर चल पड़ा है
हौसले बुलंद है उसके वो फिर लड़ पड़ा हैं
उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
क्या खो देगा आगे चलकर उसे नही पता है
क्या खो दिया उसने अबतक उसे नही पता है
अपनी धुन में मग्न सपने वो देखता है
उसे डर नही है किसी तरह का क्योंकि
गिरना,उठना, फिर चलना ये जिंदगी का फ़लसफ़ा है
उड़ता हुआ परिंदा कुछ दूर उड़ चला है
यह समय का पहिया फिर बढ़ चला है
                                (आदित्य)