Thursday, 7 June 2018

जिंदगी की हकीकत

घरो में फैले है मातम
अब खुशियां नही आती दरवाजे
किस्मत की हकीकत तो नही पता
अब तक कानो में गूँजती है
वो करुण आवाजे

ऐ रूह तुह मुकर्रर कर ले जाने का दिन अपना
अब नही कटती काली तनहा श्याह सी राते
खोया रहता हूँ खुद में खुद ही से
बेचैन सा रहता है मन मेरा
अब नही करनी किसी से बातें

हकीक़त पता है तेरी भी
तू होंगी ना मेरी कभी भी
फिर भी जिये जा रहे है तुझको
दर्द के अश्को को पीना
मरने से कम भी नही

जिंदगी तूने किरदार बदल दिए है
पीर अब भी बहुत पुरानी है
बदले नही है अभी भी हम
ना मिटी है उन जख्मो की निशानी है
            (आदित्य)

Saturday, 2 June 2018

कितना धीरे चला हूँ मैं

लोगो की भीड़ में हमेशा अकेला रहा हूँ मैं

अपने आप के भी पीछे खड़ा हूँ मैं

जिंदगी कितना धीरे चला हूँ मैं

मुझे जगाने जो और हसीन होकर आते थे

उन्ही ख्वाबो को सच समझ कर सोया रहा हूँ मैं

जिंदगी कितना धीरे चला हूँ मैं

तुफानो से टकराता तो ना जाने क्या हश्र होता मेरा

बस यही सोच कर साहिल पर रोता रहा हूँ मैं

जिंदगी कितना धीरे चला हूँ

अपने आप के कितना पीछे खड़ा रहा हूँ मै

जिंदगी कितना धीरे चला हूँ मैं

          (आदित्य)

Tuesday, 29 May 2018

हवा सी साथ रहती है

हवा सी साथ रहती है,
दुआ में बात करती है

तेरी यादें मेरी आँखों मे
पूरी रात जगती है।

डूबा रहता हूँ हर दिन ,
हर रात तेरे सपने में

अब तो समय की घड़ियाँ भी
मुझसे सवाल करती है।

मिटेंगे फासले दूरियों के
जो भी है दरम्यां अपने

मेरी आँखें यही बात
जमाने से कहती है।

हवा सी साथ रहती है,
दुआ में बात करती है।

तुझमे सिमट कर ,तुझसे लिपटकर
जगा मैं हूँ रात के हर पहर

अब तो यह काली राते भी
उन लम्हो की गवाही देती है।

तुम्हारा इल्म मुझपर इतना है,
की खफा ख़फ़ा रहता हूं तुम पर

मैं करू भी तो क्या,

यह जिंदगी ही तो मेरा

हर्फ़ दर्फ़ हर्फ़ इंतिहान लेती है।

हवा सी साथ रहती है ,
दुआ में बात करती है।

तेरी यादे मेरी आँखों मे
पूरी रात जगती है।

            (आदित्य)

Wednesday, 20 December 2017

मुमकिन हो तो

भागता फिर रहा हूँ अपने ही सवालो से

मुमकिन हो तो कुछ जवाब जिंदगी तू ही बता दे

अपनी ही बन्दिशों में जकड़ा हुआ हूं मैं

मुमकिन हो तो इस जिंदगी से आजाद करा दे

गलती बस इतनी थी पथ से भटका पथिक था मैं

गर मुमकिन हो तो मुझे मेरी मंजिल तक पहुँचा दे

सपने देख लिए थे खुली आँखों से मैंने कभी

मुमकिन हो तो उन ही सपनो से मिला दे

देखे थे डूबते हुए सूरज अक्सर शाम को आसमान में कही

अगर मुमकिन हो तो उसका ही पता बता  दे

कुछ ज्यादा मांग सकता नही तुझसे ऐ जिंदगी

मुमकिन हो तो मुझे ईशवर से ही मिला दे
                                  
               (आदित्य नाथ यादव)

Thursday, 28 September 2017

कुछ दूर हूँ

गहरे समंदर में लगाये है गोते कई

किनारो से महज कुछ दूर हूँ।

बहता हूँ पानी सा हर समय लोगो

की प्यास बुझाने के लिए

जो पानी होकर खुद की प्यास न

बुझा सके वो बहता दरिया हूँ ।

सपने देखे है बंद आँखों से कई मैंने

उनके साकार होने से कुछ दूर हूँ ।

की है कोशिश कुछ अच्छा कर जाने की

राहो की मुश्किलों से अनिभिज्ञ सपने में मग्न हूँ।

पार किया है जामें ऐ दुःख का दरिया ।

सुख के प्याले से महज कुछ दूर हूँ।

मेरा हाल भी ठीक वैसा है जैसे

भरी बरसात में गिरती स्वाति की एक बूँद।

उसे पाने के लिए प्यासे मेढ़कों की करुण ध्वंद।

आयाम,विराम, संघर्ष सब देखे है मैंने

अंधरे समाज मे ताने बाने बुने है कई मैंने

मगर इनकी हकीकत से कोसो दूर हूँ । 
  
                    (आदित्य )
                 
              

Sunday, 17 September 2017

यह क्या कर डाला??

शोरहत बुलंदियों की चाहत में
मैंने यह क्या कर डाला ।।

सोचा था अपनी सोच से
बदल सकूँ कुछ को ।।

जब देखा दिल की गहराइयों में
झांक कर

मैंने खुद को बदल डाला ।।

पीकर मैं दुःखो की हाला ।।

पढ़ता रहा कविता  मधुशाला ।।

न छलकती है आँखों से आँसू
की कुछ बुंदे ।।

यूँ नही मिलती किसीको मधुशाला

हासिल यूँ ही नही होता सबकुछ ।

बर्बाद होता है अपना बहुत कुछ ।

शोहरत ,बुलंदियों की चाहत में

खुद को तबाह कर डाला ।।

सोचा ,देखा महसूस किया तो

समझा मैंने खुद को  बदल डाला

मैंने यह क्या कर डाला क्यों

खुद को इस तरह बदल डाला ।।
                           
                              (आदित्य)

Sunday, 10 September 2017

दुःख की सुनामी

आयी थी दुःख की सुनामी जिंदगी में हमारे 

छोड़ गई हमे तिनके के सहारे।।

छीन गया सिर से वो पिता का प्यार 

हाथ मे आया तो बस नौकरी का उत्तराधिकार ।।

न  पूरी तरह अभी मैं हो पाया था कली से फूल

पिता के जाने के बाद हमे अपने ही गये भूल।।

इस नौकरी में आने के बाद थोड़ा खुश हुआ

पर न नींद आती न चैन आता

बस बेचैन मन यही सोचता कि क्या मैं

मृतक आश्रित नौकरी करने के लिए पैदा हुआ।।

यह प्रशिक्षण तो बहाना था दोस्तो 

हम लोगो को बस अपना दुःख बाँटना था।।

बुरी लतो को छोड़ दो दोस्तों

बढ़ चलो अपने भविष्य की ओर 

क्योंकि मैं नही चाहता किसी और के

कदम बड़े मृतक आश्रित नौकरी के और ।।।।।।।

                                                    (आदित्य)